पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी बिगुल बजने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक ऐसा ‘ज्वालामुखी’ फट गया है, जिसने दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है।
बंगाल भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कुछ ऐसे बयान दिए हैं, जो पार्टी की चुनावी रणनीतियों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के ठीक 24 घंटे बाद दिलीप घोष का यह रूप देखकर हर कोई हैरान है। उन्होंने न केवल पार्टी के ‘नए’ नेताओं को आईना दिखाया है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि बंगाल की सत्ता का रास्ता केवल धार्मिक नारों से होकर नहीं गुजरता। बंगाल की मिट्टी पर ‘पुराने बनाम नए’ की यह जंग अब एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ गई है।
दिलीप घोष ने पार्टी की कोर विचारधारा पर चोट करते हुए एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल धार्मिक मुद्दों के आधार पर चुनाव जीतना अब मुमकिन नहीं है। घोष ने बेबाकी से कहा, “अयोध्या में इतना भव्य राम मंदिर बनने के बावजूद भाजपा फैजाबाद की सीट हार गई। यह इस बात का सबूत है कि मंदिर-मस्जिद के मुद्दे चुनावी नतीजों को पूरी तरह प्रभावित नहीं करते।” उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी तंज कसते हुए कहा कि अगर वे सोचती हैं कि मंदिर बनवाकर 2026 की वैतरणी पार कर लेंगी, तो यह उनकी बड़ी गलतफहमी है। घोष के इस बयान को भाजपा की पारंपरिक राजनीति से हटकर एक नई चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
दिलीप घोष के निशाने पर सबसे ज्यादा वो नेता रहे जो 2021 के चुनावों से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। बिना नाम लिए उन्होंने शुभेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भाजपा में हर व्यक्ति एक कार्यकर्ता है और जो लोग हाल ही में पार्टी में आए हैं, उन्हें अपनी पहचान और उपयोगिता खुद साबित करनी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी पर थोपे गए नए चेहरे पुराने कार्यकर्ताओं की मेहनत को नजरअंदाज नहीं कर सकते। दिलीप घोष का यह गुस्सा बताता है कि पार्टी के भीतर सांगठनिक स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और ‘पुराने चावल’ अपनी उपेक्षा से बेहद आहत हैं।
पहली बार दिलीप घोष ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्हें पार्टी के भीतर अलग-थलग करने की साजिश रची गई। उन्होंने कहा, “मेरे खिलाफ झूठे एजेंडे फैलाए गए और मुझे किनारे करने की कोशिश की गई, लेकिन मैं खो जाने से नहीं डरता।” घोष ने हार मानने के बजाय अब अपनी पुरानी जमीन तलाशनी शुरू कर दी है। उन्होंने वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार से मिलकर खड़गपुर में तीन दिनों के अभियान की अनुमति मांगी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे 2026 के विधानसभा चुनाव में अपनी घरेलू सीट ‘खड़गपुर सदर’ से ही मैदान में उतरेंगे। यह भाजपा नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि घोष ने अब अपनी राह खुद चुन ली है।
पार्टी के भीतर बढ़ती इस कलह को भांपते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने अब बंगाल में ‘डैमेज कंट्रोल’ शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जल्द ही कोलकाता का दौरा करेंगे। वहीं, जनवरी के तीसरे हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर बंगाल में एक विशाल जनसभा को संबोधित कर सकते हैं। गृह मंत्री अमित शाह भी जनवरी के अंत तक दोबारा कोलकाता आएंगे ताकि संगठनात्मक गुटबाजी को खत्म किया जा सके। भाजपा आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वे दिलीप घोष जैसे पुराने योद्धाओं के अनुभव और शुभेंदु अधिकारी जैसे नए नेताओं के प्रभाव के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।

