पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के कारण दे भी कानूनी संकट में बरुई तरह से फंसती नजर आ रही हैं।
8 जनवरी को कोलकाता में ED (प्रवर्तन निदेशालय) द्वारा I-PAC के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी का अचानक पहुंचना और फाइलें लेकर निकल जाना अब उनके लिए गंभीर नतीजों की राह तेजी स खोल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई हाल ही की सुनवाई में ममता सरकार और उनके अधिकारियों के खिलाफ कई गंभीर टिप्पणियां और निर्देश जारी किए गए हैं। कोर्ट ने साफ़ कहा है कि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में हस्तक्षेप करना एक गंभीर मामला है और इसके लिए राजनीतिक पद या ताकत कोई भी छूट नहीं दे सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी और उनके अधिकारियों को ये 5 बड़े झटके दिए हैं:
1. नोटिस जारी: कोर्ट ने ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
2. FIR पर रोक: ममता सरकार द्वारा ED अफसरों के खिलाफ दर्ज की गई FIR पर कोर्ट ने तत्काल रोक लगा दी।
3. दखल गंभीर मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल देना गंभीर रूप से कानूनी अपराध है।
4. साक्ष्यों का संरक्षण: कोर्ट ने कहा कि रेड से संबंधित सभी CCTV फुटेज और अन्य डिवाइस को संरक्षित रखा जाए।
5. राजनीतिक आड़ का सवाल: कोर्ट ने पूछा कि क्या पार्टी के नाम का प्रयोग कर केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाई को रोका जा सकता है।
ममता बनर्जी का ‘स्टंट’ और उसका उलटा प्रभाव
8 जनवरी 2026 को जब ED ने कोलकाता में I-PAC के ठिकानों पर रेड मारी, ममता बनर्जी वहां पहुंचीं और फाइलें लेकर बाहर आ गईं। उस वक़्त उन्होंने दावा किया था कि ये फाइलें TMC की रणनीति से जुड़ी हैं और उन्हें बचाना बेहद आवश्यक था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में यह दलील स्वीकार नहीं की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में राजनीतिक आड़ डालना कानून के खिलाफ है।
ED ने कोर्ट में यह भी साफ़ किया कि बंगाल पुलिस के DGP को तत्काल प्रभाव से हटाया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ममता बनर्जी के इस कदम में साथ दिया और जांच में रुकावटें पैदा की। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि आगामी कुछ दिनों में ममता सरकार और उनके अधिकारियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया अब तेज़ होने वाली है।
हाईकोर्ट और SC दोनों से बड़े झटके
कोलकाता हाईकोर्ट ने पहले ही TMC की याचिका खारिज कर दी थी जिसमें पार्टी का दावा था कि ED ने उनके डेटा को जब्त किया। हाईकोर्ट ने कहा कि ED ने कोई गलत काम नहीं किया और इसके उलट , रेड के दौरान ममता बनर्जी ने सबूत खुद ले लिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में भी वही स्थिति सामने आई।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आफ किया कि यदि कोई केंद्रीय एजेंसी सच्चाई की जांच कर रही है, तो उसे किसी भी हाल में रोका नहीं जा सकता। साथ ही, कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया में एजेंसियों के हस्तक्षेप की भी सीमा तय की।
कोर्ट में बहस और वकीलों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि I-PAC की रेड कानूनी और न्यायसंगत थी। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दावा किया कि ममता पार्टी प्रमुख के रूप में आई थीं, न कि मुख्यमंत्री के तौर पर। उन्होंने यह भी कहा कि रेड के दौरान ममता ने केवल लैपटॉप, iPhone और कुछ दस्तावेज़ ही बचाए।
हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों पर विरोधाभासों की तरफ इशारा किया। एक तरफ कहा गया कि रेड के दौरान डेटा जब्त नहीं हुआ, वहीं फोटो या फाइल उठाकर ले जाने का मामला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के विवादों को बेहद गंभीर बताया और कहा कि कानून के अंतर्गत दखल न देना और प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी है।
अब.. आगे की सुनवाई और संभावित नतीजे
बता दे, सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई 3 फरवरी 2026 तय की है। इसके बाद ही यह साफ़ होगा कि ममता बनर्जी के खिलाफ CBI जांच होगी या नहीं, उनके अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होगी या नहीं, और कहीं FIR दर्ज होने की संभावना बनी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला बंगाल विधानसभा चुनाव पर भी बेहद गंभीर रूप से प्रभाव डाल सकता है और ममता की राजनीतिक स्थिति को चुनौती दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणियों और ED की मजबूत दलीलों ने साफ संकेत दिया है कि ममता बनर्जी के लिए आगामी वक़्त में बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। राजनीतिक, कानूनी और प्रशासनिक दबावों का यह तंत्र अब बंगाल की सियासत और TMC के अंदर हलचल बढ़ा सकता है।

